मंत्र: अंधविश्वास या मन का विज्ञान

(श्रृंखला: मन, शब्द और चेतना — भाग 1)

आज इंटरनेट के इस वैज्ञानिक युग में, जब हम ‘मंत्र’ (Mantra) शब्द सुनते हैं, तो समाज दो वर्गों में बंटा दिखाई देता है। एक वर्ग इसे आस्था और शक्ति का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा इसे ‘छद्म विज्ञान’। एक वर्ग ऐसा भी है जो मंत्रों में श्रद्धा तो रखता है मगर मंत्रों को बिना सोचे समझे बस दोहराने वाले शब्दों के रुप में जानता है।ऐसे में यह विश्लेषण करना आवश्यक है कि मंत्र है क्या-“मंत्र: अंधविश्वास या मन का विज्ञान?

मंत्र अन्धविश्वास नही हो सकते

हजारों वर्षों से मंत्र हमारी भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। शुभ हो या अशुभ, बिना मंत्रोच्चार के भारत में कोई कार्य सम्पन्न नहीं होता।

क्या आपने कभी सोचा है कि हज़ारों सालों से चली आ रही मंत्र परंपरा को सिर्फ कोरी कल्पना कहा जा सकता है?

प्राचीन ऋषियों ने मंत्रों को ‘ध्वनि की शक्ति’ (Power of Sound) कहा था। आज का आधुनिक विज्ञान, विशेषकर क्वांटम फिजिक्स और न्यूरोसाइंस, धीरे-धीरे उन रहस्यों से पर्दा उठा रहा है।

मंत्र अन्धविश्वास या मन का विज्ञान” यह संशय उन्ही मनुष्यों के मन में उठ सकता है जो मंत्रो के विषय में कुछ ज्ञान नही रखते. जिसने मंत्रो की उपयोगिता और महत्व को समझ लिया है उसके लिए तो मंत्र मन को ऊर्जा के उच्च स्तर तक पहुंचाने का साधन हैं.

यदि आप भी नियम पूर्वक मंत्रों का उच्चारण करते हैं तो आपने कुछ तो अनुभव किया होगा कि जब आप बार बार किसी मंत्र का उच्चारण करते हैं तो वास्तव में आपके भीतर क्या घटित होता है।

आइये अपने अंतर्मन के सफ़र पर चलें

आपके भीतर कुछ तो सकारात्मक अवश्य घटित होता होगा तभी तो आपने अपनी दिनचर्या में मंत्रों को स्थान दिया होगा.

क्या अनुभव किया आपने —

क्या मंत्र केवल ईश्वर को प्रसन्न करने का साधन है,
या फिर मन को समझने और साधने की एक गहन प्रक्रिया?

मंत्र, मन और चेतनाभीतर की यात्रा का पहला द्वार हैं।

हम सब अपने जीवन में कुछ न कुछ बेहतर चाहते हैं — शांति, स्पष्टता, आत्मविश्वास, या बस मन की थकान से मुक्ति।
लेकिन अक्सर हम बाहर की परिस्थितियों को बदलने में लगे रहते हैं, जबकि असली परिवर्तन भीतर से शुरू होता है।
यहीं से शुरू होती है —
मंत्र, मन और चेतना की यात्रा।



Note–“यह लेख श्रृंखला: मन, शब्द और चेतना का पहला कदम है, जहाँ हम समझेंगे कि मंत्र क्या है


मंत्र क्या है –

केवल शब्द नहीं, एक शुद्ध ध्वनि ‘

मंत्र’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है—
मन + त्र
अर्थात् मन को पार ले जाने वाला साधन
इस दृष्टि से देखें तो मंत्र का उद्देश्य ईश्वर को प्रभावित करना नहीं,
बल्कि अपने मन को समझना और उसे शांत करना है।अक्सर मंत्र को हम एक धार्मिक या परंपरागत शब्द मान लेते हैं।
लेकिन मंत्र सिर्फ उच्चारित शब्द नहीं होता।
मंत्र = ध्वनि + भाव + चेतना
संस्कृत में कहा गया है:
“मन्त्रः मननात् त्रायते”
अर्थात जो मनन करने पर मन को मुक्त करे — वही मंत्र है।
मंत्र:
• मन को एक दिशा देता है
• बिखरी ऊर्जा को केंद्रित करता है
• अवचेतन (subconscious mind) को धीरे-धीरे शुद्ध करता है

वैज्ञानिक दृष्टि से मंत्र क्या है

विज्ञान मंत्र को धार्मिक क्रिया के रूप में नहीं,
बल्कि ध्वनि, पुनरावृत्ति और एकाग्रता के रूप में समझता है।

आधुनिक विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि हमारा समूचा अस्तित्व ऊर्जा का स्पंदन  है, स्‍पंदन का स्‍तर अलग अलग होता है। जहां भी कोई स्पंदन होता है, वहां ध्वनि होनी ही है।

रूप या आकार अलग-अलग तरह के होते हैं और हर रूप के साथ एक ध्वनि जुड़ी होती है और हर ध्वनि के साथ एक रूप जुड़ा होता है। जब आप कोई ध्वनि मुंह से निकालते हैं, तो उसके साथ एक रूप बनता  है। ध्वनियों को एक खास तरह से इस्तेमाल करने का एक पूरा विज्ञान है, जिससे सही तरीके के रूप बनाया जा सके।

मंत्र कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसका आप बिना कुछ समझ के उच्चारण करते हैं, यह वह चीज है जिसके द्वारा जो आप बनना चाहते हैं, बन सकते हैं क्योंकि पूरा अस्तित्व ध्वनियों का एक जटिल संगम है।

इसे इस तरह समझा जा सकता है कि

• किसी शब्द की निरंतर पुनरावृत्ति से मस्तिष्क में एक लयबद्ध तरंग बनती है
• यह लय मन को भटकने से रोकती है
• श्वास और ध्वनि मिलकर तंत्रिका तंत्र को शांत संकेत भेजते हैं
इसी कारण मंत्र—
• एकाग्रता बढ़ाता है
• बेचैनी को कम करता है
• मन को एक बिंदु पर टिकने में सहायता करता है

हमारे ऋषियों ने जो आध्यात्मिकता के साथ साथ वैज्ञानिक समझ भी रखते थे, उसमें से कुछ ध्वनियों को पहचाना जो ब्रह्मांड के हर आयाम को खोलने वाली कुंजियों की तरह हैं। जब तक आप खुद चाभी नहीं बन जाते, वह आपके लिए नहीं खुलेगा।

मंत्र बनने का मतलब है कि आप चाभी बन रहे हैं, चाभी बन कर ही आप ताले को खोल सकते हैं।

उपरोक्त व्याख्या से समझा जा सकता है कि मंत्रों को इस प्रकार से रचा गया है कि उनकी ध्वनि हमें मन से चेतना के स्तर तक ले जाती है

प्राचीन भारतीय दर्शन में मंत्रों को केवल शब्द नहीं, बल्कि ‘ऊर्जा के पैकेट’ माना गया है।

इन प्रभावों के लिए किसी धार्मिक विश्वास की आवश्यकता नहीं होती।

फिर अंधविश्वास कहाँ से आता है?

मंत्र अन्धविश्वास तो बिल्कुल नही है बल्कि मन का तंत्र है, मन को साधने का यंत्र है, यह ऊपर दिए गये विश्लेषण के आधार पर हम कह सकते हैं.

अंधविश्वास तब जन्म लेता है जब—
• मंत्र को समझ कर नहीं केवल फल की इच्छा से दोहराया जाता है
• बिना जागरूकता के मात्र रटा हुआ बोल दिया जाता है
• जैसे कोई यंत्र स्वचालित रूप से चल रहा हो
जब चेतना अनुपस्थित होती है, ऐसे में मंत्र भी केवल एक यांत्रिक क्रिया बनकर रह जाता है और लोग इच्छित परिणाम ना पा कर मंत्रों को अंधविश्वास मान लेते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से

ओशो कहते हैं—
“मंत्र का उद्देश्य शब्द पर टिके रहना नहीं,
बल्कि शब्दों के बीच की खामोशी को अनुभव करना है।”

मन की शांति ही योग है।

गीता भी यही संकेत देती है ☝️

अर्थात् मंत्र का अंतिम लक्ष्य है—
• शब्द से आगे जाना
• और साक्षी भाव में प्रवेश करना

एक छोटा सा अनुभव (पाठक के लिए)

अगले दो मिनट—
• आँखें बंद करें
• किसी भी एक शब्द को मन में धीरे-धीरे दोहराएँ
• शब्द से अधिक, उसके बाद आने वाली शांति पर ध्यान दें
जो अनुभूति होगी, वही आपका उत्तर है।

अंत में एक प्रश्न

यदि मंत्र केवल अंधविश्वास होता,
तो क्या मानव हजारों वर्षों से इसे अपनी चेतना को समझने का साधन बनाता?
शायद मंत्र ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग नहीं,
स्वयं से मिलने की एक प्रक्रिया है।

अंतिम बात

मंत्र अन्धविश्वास तो बिल्कुल नही है बल्कि मन का तंत्र है, मन को साधने का शक्तिशाली साधन है, यह ऊपर दिए गये विश्लेषण के आधार कहा जा सकता है. मंत्र हमारी भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा हैं.

अगले लेख में हम जानेंगे कि मन कैसे काम करता है, और चेतना से इसका गहरा संबंध कैसे बनता है।

मंत्र अंधविश्वास या मन का विज्ञान‘ इस लेख ने आपके मन को छुआ हो तो अपने विचारों से अवगत कराएँ….

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Qu.1 क्या मंत्र केवल अंधविश्वास है?

नहीं। सही दृष्टि से देखा जाए तो मंत्र मन को स्थिर और जागरूक करने की एक प्रक्रिया है। मंत्र तब अंधविश्वास बनता है जब उसे बिना समझ और चेतना के, केवल फल की अपेक्षा से दोहराया जाता है।

Qu.2 क्या वैज्ञानिक रूप से मंत्र का प्रभाव समझा जा सकता है?

हाँ। मंत्र को ध्वनि, पुनरावृत्ति और एकाग्रता के रूप में देखा जा सकता है। किसी शब्द की लयबद्ध पुनरावृत्ति मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर शांत प्रभाव डालती है।

Qu.3 क्या मंत्र जपने के लिए धार्मिक होना ज़रूरी है?

नहीं। मंत्र का उपयोग किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है, चाहे उसकी धार्मिक आस्था कुछ भी हो। इसका प्रभाव मन और चेतना से जुड़ा होता है, न कि किसी विशेष धर्म से।

Qu.4 क्या बिना समझ के मंत्र दोहराने से लाभ होता है?

कुछ हद तक ही एकाग्रता बढ़ सकती है, लेकिन गहरा प्रभाव तभी आता है जब मंत्र को जागरूकता और समझ के साथ किया जाए। चेतना के बिना मंत्र केवल यांत्रिक क्रिया बन जाता है।

Qu.5 क्या मंत्र ध्यान का ही एक रूप है?

हाँ। मंत्र ध्यान का एक सरल और प्रभावी रूप माना जाता है, जो मन को एक बिंदु पर टिकाने और आंतरिक शांति की ओर ले जाने में सहायता करता है।

आपका इस विषय पर क्या अनुभव या विचार है?

यदि इस लेख ने आपके मन को छुआ हो तो अपने विचार नीचे comment box में अवश्य साझा करें


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