(श्रृंखला: मन, मंत्र और चेतना — भाग 3)
भूमिका
श्रृंखला के भाग 3 में हम जानेंगे कि ‘चेतना क्या है‘।
पिछले लेखों में हमने यह समझने की कोशिश की कि मंत्र मन पर कैसे प्रभाव डालता है
और मन किस तरह हमारे अनुभवों को आकार देता है।
पढ़िए इस श्रृंखला के पिछले लेख —
लेकिन एक प्रश्न अब भी शेष है—
मन स्वयं किसमें घटित होता है?
हम अक्सर कहते हैं—
“मेरा मन ठीक नहीं है”
“मेरा ध्यान भटक रहा है”
“मुझे भीतर शांति चाहिए”
लेकिन शायद ही हमारे मन में कभी यह बुनियादी प्रश्न उठता है कि —
यह ‘मैं’ कौन है जो मन को देख रहा है?
मन सोचता है,
शब्द गूँजते हैं,
मंत्र दोहराया जाता है—
पर इन सबको जान कौन रहा है?
यहीं से चेतना का प्रश्न जन्म लेता है।
चेतना को सरल शब्दों में समझें
प्रश्न उठता है कि ‘चेतना क्या है‘ तो चेतना कोई रहस्यमय शक्ति नहीं है।
चेतना सोच से पहले की अवस्था है।
चेतना कोई विचार नहीं है।
चेतना कोई भावना नहीं है।
चेतना तो वह जागरूकता है
जिसमें विचार और भावनाएँ प्रकट होती हैं।
जैसे—
आकाश में बादल आते-जाते हैं,
पर आकाश स्वयं न गीला होता है
न भारी।
वैसे ही मन में विचार उठते-डूबते हैं,
लेकिन जो उन्हें देख रहा है—
वही चेतना है।
सबसे सरल शब्दों में—
चेतना = जानने की क्षमता (awareness)
मन और चेतना: कर्ता और साक्षी
हम आमतौर पर मन को ही “मैं” मान लेते हैं।
लेकिन ध्यान से देखें तो
मन लगातार बदलता रहता है।
• कभी प्रसन्न
• कभी चिंतित
• कभी एकाग्र
• कभी भटका हुआ
जो बदल रहा है,
वह स्थायी कैसे हो सकता है?
चेतना वह साक्षी है
जो मन की हर अवस्था को देखती है
पर स्वयं वैसी नहीं बनती।
मन और चेतना में सूक्ष्म अंतर
अक्सर हम मन और चेतना को एक ही मान लेते हैं,
जबकि दोनों का संबंध उपकरण और उपयोगकर्ता जैसा है।
• मन → सोचता है, विश्लेषण करता है, कल्पना करता है
• चेतना → देखती है, जानती है, साक्षी रहती है
मन बदलता है,
चेतना स्थिर रहती है।
मन अशांत हो सकता है,
चेतना स्वयं अशांत नहीं होती—
बस ढकी हुई प्रतीत होती है।
क्या चेतना व्यक्तिगत है?
यह प्रश्न बहुत गहरा है।
हम कहते हैं— मेरी चेतना
लेकिन अनुभव में देखें तो
चेतना में “मेरा” कुछ भी नहीं होता।
जैसे बिजली एक है,
पर बल्ब अलग-अलग हैं।
वैसे ही चेतना एक है,
मन अलग-अलग।
मंत्र, ध्यान और साधना
असल में मन को इतना शांत करते हैं
कि वह चेतना की रोशनी को
बिना विकृति के प्रतिबिंबित कर सके।
मंत्र: चेतना की ओर लौटने का साधन
मंत्र चेतना की ओर लौटने का साधन है।
मंत्र चेतना को बनाते नहीं,
बल्कि उसे उजागर करते हैं।
जब मंत्र दोहराया जाता है—
• मन की अनावश्यक तरंगें कम होती हैं
• ध्यान वर्तमान क्षण में टिकता है
• चेतना स्वयं को पहचानने लगती है
इसलिए मंत्र का प्रभाव जादू नहीं, आंतरिक स्पष्टता है।
consciousness या चेतना के बारे में wekpedia पर भी जानकारी मिलेगी
अभ्यास से पुष्टि करें
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यदि आप इस लेख ‘चेतना क्या है’ को पढ़ रहे हैं तो
आप एक पल के लिए रुक जाएँ—
और देखें कि
इन शब्दों को पढ़ने वाला
कौन है,
तो वही क्षण
चेतना की पहली झलक है। यही सवाल “चेतना क्या है” का जबाब है।
श्रंखला का अगला लेख:
चेतना की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक व्याख्या (भाग 4)
जिस में हम प्रवेश करेंगे
निम्न गहरे प्रश्नों में—
👉 क्या चेतना को साधा जा सकता है?
👉 ध्यान, मंत्र और मौन की भूमिका क्या है?
यहीं से
सिद्धांत से अनुभव की यात्रा शुरू होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
चेतना क्या है?
चेतना वह जागरूकता है जिससे हम अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को जानते हैं।
सरल शब्दों में, जो अनुभव को जानता है वही चेतना है।
क्या चेतना और मन एक ही हैं?
नहीं।
मन सोचता है, याद करता है और कल्पना करता है।
जबकि चेतना मन की इन गतिविधियों को देखती और जानती है।
मन बदलता रहता है, चेतना जानने की क्षमता है।
क्या चेतना दिमाग से पैदा होती है?
विज्ञान अभी इस प्रश्न पर पूरी तरह सहमत नहीं है।
कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि चेतना मस्तिष्क से उत्पन्न होती है,
जबकि कुछ इसे मूल जागरूकता मानते हैं जिसे मस्तिष्क व्यक्त करता है।
यह विषय अभी भी शोध का क्षेत्र है।
क्या चेतना को देखा या महसूस किया जा सकता है?
चेतना को किसी वस्तु की तरह नहीं देखा जा सकता,
लेकिन इसे अनुभव किया जा सकता है।
जब आप अपने विचारों को देख रहे होते हैं,
तभी आप चेतना में होते हैं।
क्या सभी मनुष्यों में चेतना समान होती है?
चेतना की मूल क्षमता सभी में होती है।
लेकिन मन, संस्कार और अनुभव अलग होने के कारण
उसकी अभिव्यक्ति अलग दिखाई देती है।
मंत्र और चेतना का क्या संबंध है?
मंत्र सीधे चेतना पर काम नहीं करता।
वह मन को एकाग्र और शांत करता है।
जब मन शांत होता है, तो चेतना अधिक स्पष्ट अनुभव होती है।
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