चेतना की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक व्याख्या- भाग 4

(Spiritual and Scientific Interpretation of Consciousness)

श्रंखला के पिछले लेख “चेतना क्या है” लेख में हमने चेतना को सरल शब्दों में समझा था। अब इस लेख में हम चेतना की अध्यात्मिक और वैज्ञानिक व्याख्या करने का प्रयास करेंगे

भूमिका

चेतना क्या है?
क्या यह केवल जागरूकता (awareness) है?
क्या यह मस्तिष्क की क्रिया है?
या यह आत्मा का स्वरूप है?

जब हम चेतना की बात करते हैं तो “चेतना” शब्द का अर्थ संदर्भ के अनुसार बदल जाता है। सामान्य भाषा में चेतना का अर्थ है — जागरूक होना

एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं-

जैसे माता पिता बच्चों को उनके भविष्य के प्रति चेताते हुए कहते हैं कि ‘चेत जाओ, अभी भी वक़्त है’। अर्थात संभल जाओ, सजग हो जाओ, aware हो जाओ या जागरुक हो कर अपना आचरण संभाल लो।

वैज्ञानिक दृष्टि में यह मस्तिष्क की सक्रिय अवस्था है। आमतौर पर साधारण जीवन में यही अर्थ लिया जाता है।

किंतु आध्यात्मिक दृष्टिकोण से चेतना को आत्मा का प्रकाश माना जाता है।

इस लेख में हम चेतना की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक व्याख्या करने और समझने का प्रयास करेंगे।

यह लेख “मंत्र, मन और चेतना” श्रृंखला का भाग 4 है

1. चेतना का सामान्य अर्थ

चेतना का मूल अर्थ है —
स्वयं और अपने आसपास की उपस्थिति का बोध।

इसे वैज्ञानिकों ने दो भागों में बांटा है:

  • Soft Problem: यह समझना कि मस्तिष्क बाहरी संकेतों (जैसे रोशनी या आवाज) को कैसे प्रोसेस करता है।
  • Hard Problem: यह समझना कि ये भौतिक प्रक्रियाएं ‘अनुभव’ (जैसे प्यार, दर्द या रंग का अहसास) में कैसे बदल जाती हैं।

जब हम देखते हैं, सुनते हैं, सोचते हैं या अनुभव करते हैं —
तो यह सब चेतना के माध्यम से ही संभव होता है। लेकिन प्रश्न यही उठता है कि —
क्या यह केवल मस्तिष्क की प्रक्रिया है?
या इसके पीछे कोई गहरा अस्तित्व भी है?

2. चेतना की वैज्ञानिक व्याख्या

आधुनिक विज्ञान चेतना को मस्तिष्क की जटिल तंत्रिका गतिविधियों का परिणाम मानता है।

न्यूरोसाइंस के अनुसार:

  • मस्तिष्क के विभिन्न भाग sensory input लेते हैं
  • जानकारी का विश्लेषण होता है
  • प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है
  • और यही प्रक्रिया “conscious experience” बनाती है

कुछ प्रमुख वैज्ञानिक सिद्धांत:

  • Global Workspace Theory
  • Integrated Information Theory

इन सिद्धांतों के अनुसार चेतना एक emergent property है अर्थात् जब मस्तिष्क की गतिविधि एक स्तर तक पहुँचती है, तब चेतना प्रकट होती है।

इस दृष्टि से : चेतना एक Brain Function है।

3. चेतना की आध्यात्मिक व्याख्या

आध्यात्मिक परंपराएँ चेतना को केवल जैविक प्रक्रिया नहीं मानतीं। उनके अनुसार:

  • शरीर बदलता है
  • मन बदलता है
  • विचार बदलते हैं
  • लेकिन “साक्षी” बना रहने वाला तत्व नहीं बदलता

यही ना बदलने वाला तत्व चेतना है। यही भारतीय दृष्टिकोण भी है। यह दृष्टिकोण कहता है:

चेतना शरीर में उत्पन्न नहीं होती,
बल्कि शरीर चेतना में प्रकट होता है।

गीता में क्या कहा गया है

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय (सांख्य योग) में
कृष्ण
अर्जुन को आत्मा का स्वरूप समझाते हुए कहते हैं:

आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।

यह संकेत देता है कि चेतना (आत्मा) शरीर से परे, शाश्वत तत्व है।

यहाँ चेतना को केवल जागरूकता नहीं, बल्कि अविनाशी सत्ता के रूप में देखा गया है।

यह संकेत देता है कि चेतना (आत्मा) शरीर से परे, शाश्वत तत्व है।

यहाँ चेतना को केवल जागरूकता नहीं, बल्कि अविनाशी सत्ता के रूप में देखा गया है।

4. क्या चेतना = आत्मा?

यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या चेतना को आत्मा कहा जा सकता है।

वैज्ञानिक दृष्टि:
चेतना = मस्तिष्क की क्रिया

आध्यात्मिक दृष्टि:
चेतना = आत्मा का प्रकाश

लेकिन एक मध्य मार्ग भी है।

कुछ दार्शनिक कहते हैं:

  • Awareness (जागरूकता) चेतना की अभिव्यक्ति है
  • आत्मा चेतना का मूल स्रोत है

अर्थात:

जागरूकता अनुभव है
चेतना उसका आधार है

ओशो के अनुसार


हर अस्तित्व की तीन पर्तें हैं। गहनतम पर्त साक्षी चेतना की है, मध्य में जीवन-ऊर्जा है और सतह पर पदार्थ है, भौतिक शरीर है।
यह विधि कहती है, “यह चेतना ही प्रत्येक प्राणी के रूप में है, अन्य कुछ भी नहीं है।’

यदि तुम अपने शरीर में प्रवेश करो तो वहां भी ये तीन पर्तें हैं। केवल सतह पर तुम्हारा शरीर है। शरीर भौतिक दिखाई पड़ता है, पर उसके भीतर प्राण की, जीवंत ऊर्जा की धाराएं बहती हैं। उस जीवंत ऊर्जा के बिना तुम्हारा शरीर बस एक लाश रह जाएगा। इसके भीतर कुछ बह रहा है, उसके कारण ही यह जीवित है। यही ऊर्जा है। लेकिन गहरे और गहरे में तुम द्रष्टा हो, साक्षी हो। तुम अपने शरीर और ऊर्जा दोनों को देख सकते हो। वह द्रष्टा ही तुम्हारी चेतना है।

5. क्या विज्ञान और अध्यात्म विरोधी हैं?

उपरोक्त रूप से चेतना की वैज्ञानिक और अध्यात्मिक व्याख्या करने से यह तो नहीं कहा जा सकता कि इस विषय पर विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे के विरोधी हैं बल्कि एक दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं।

विज्ञान “कैसे” (How) पूछता है।
अध्यात्म “कौन” (Who) पूछता है।

विज्ञान पूछता है —
चेतना कैसे उत्पन्न होती है?

अध्यात्म पूछता है —
जो अनुभव कर रहा है वह कौन है?

दोनों अलग दिशाओं से एक ही रहस्य को देख रहे हो सकते हैं।

6. निष्कर्ष

चेतना की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक व्याख्या करने से स्पष्ट होता है कि-

चेतना को केवल जागरूकता कहना अधूरा है।
उसे केवल आत्मा कहना भी कुछ लोगों के लिए पर्याप्त नहीं। विज्ञान उसे मस्तिष्क की प्रक्रिया मानता है।
अध्यात्म उसे शाश्वत तत्व मानता है।

शायद सत्य इन दोनों के बीच संवाद में छिपा है।

चेतना वह प्रकाश है जिसके बिना न विज्ञान संभव है, न अध्यात्म।


श्रृंखला का अगला लेख- “मंत्र, मन और चेतना में संबंध”

यदि इस लेख में चेतना की आध्यात्मिक और वैज्ञानिक व्याख्या ने आपके ज्ञान में कुछ वृद्धि की हो तो अपने विचार अवश्य दें….


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

  1. चेतना का सरल अर्थ क्या है?

    चेतना का सामान्य अर्थ है — स्वयं और अपने आसपास के वातावरण के प्रति जागरूक होना। यह अनुभव करने की क्षमता है।

  2. क्या चेतना और आत्मा एक ही हैं?

    आध्यात्मिक दृष्टिकोण में चेतना को आत्मा का स्वरूप माना जाता है, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि में इसे मस्तिष्क की प्रक्रिया समझा जाता है।

  3. क्या विज्ञान चेतना को समझ पाया है?

    विज्ञान ने चेतना पर कई सिद्धांत दिए हैं, जैसे न्यूरोसाइंस आधारित मॉडल, लेकिन चेतना का पूर्ण रहस्य अभी भी शोध का विषय है।

  4. भगवद्गीता में चेतना के बारे में क्या कहा गया है?

    भगवद्गीता के सांख्य योग में आत्मा को अविनाशी बताया गया है, जो चेतना की शाश्वतता का संकेत देता है

  5. क्या चेतना शरीर से स्वतंत्र हो सकती है?

    यह विषय दार्शनिक और आध्यात्मिक विमर्श का हिस्सा है। कुछ परंपराएँ इसे शरीर से स्वतंत्र मानती हैं, जबकि विज्ञान इसे मस्तिष्क से जुड़ा मानता है। ओशो के विचार भी इस विषय पर महत्त्वपूर्ण हैं।

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